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निरंतर सीखने का नाम है पत्रकारिता

Posted On: 24 Jun, 2017 में

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तीन दशक पूर्व हिन्दी पत्रकारिता में एक नाम उभरकर सामने आया। वह नाम था एसी सिंह यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह का। इस व्यक्ति में हर दिन कुछ न कुछ नया करने का इरादा था। दूसरों को भी इसके लिए वे सदा प्रेरित करते रहते थे। इनके काम करने की कार्यशैली दूसरे संपादकों से अलग थी। काम के समय में वे जितने धीर-गंभीर दिखते थे,उतने सहज काम काम के बाद रहते थे। वह अक्सर अपने सहयोगियों को बड़ी-बड़ी बातें मजाक में कह दिया गया करते थे। उनकी कही हुईं बातों का उत्तर दे पाना अच्छे-अच्छे लोगों के लिए संभव नहीं हो पाता था। वे अपनी पत्नी और भाइयों से भी अक्सर कहा कहते थे कि पत्रकारिता जीवनपर्यन्त सीखने का अविराम सिलसिला है। इस सूत्र वाक्य को जीवन में अपनाएगा, वही पत्रकारिता के क्षेत्र में आगे बढ़ेगा। उनकी पत्नी भी अंग्रेजी की बेहतर पत्रकार थीं। पर दोनों की लाइफस्टाइल अलग-अलग थी। इनमें खबर पहचाने की क्षमता अद्भुत थी। मुझे यह लिखने में कोई संकोच नहीं कि छोटी खबरों को किस तरह विस्तार दिया जाए, यह केवल और केवल एसपी ही जानते थे। छोटे पत्रकारों को प्रोत्साहित करना वह बेहतर तरीके से जानते थे। उनदिनों रविवार में उदयन शर्मा की तूती बोलती थी। एसपी अक्सर उन्हें पंडितजी कहा करते थे। दोनों के बीच घंटों छोटी सी रिपोर्ट को लेकर बहस चलती रहती थी। सुझावों पर वे बड़े गौर से विचार करते थे। एसपी की सगी बहन की शादी मेरे ही इलाके में थी। जिस गांव में शादी थी,उस गांव का नाम मिल्की है। पत्रकारिता में रहने की वजह से वे कम ही रिश्तेदारों के यहां जाते थे। लेकिन जब भी रिश्तेदारों के यहां आते तो लगता ही नहीं कि देश का इतना बड़ा पत्रकार छोटे से कस्बे में आया हो। बड़े-बड़े साहित्यकार, संपादक तक उनका हाल जानने के लिए व्यग्र रहते थे। उनकी व्यग्रता में मैं उलझना नहीं चाहता। मैं भी उनदिनों नवभारत टाइम्स में छोटा पत्रकार था। लेकिन पत्रकार होने की वजह से एसपी को पहले से जानता था। रिश्तेदारी की वजह से उनसे मिलने और बात करने का अवसर भी मिला। उनसे दो सीख मिली। मैंने सवाल किया था कि बड़ा पत्रकार व्यक्ति कैसे बनता है। बड़े ही सहज भाव में उन्होंने मुझे उत्तर दिया। कोई बड़ा पत्रकार नहीं होता। यह ऐसी विधा है,जहां व्यक्ति जीवनपर्यन्त सीखते रहता है। जो जितना बेहतर सीखता है,वह उतना बड़ा पत्रकार कहलता है। फिर उन्होंने यह भी कहा कि अवसर के साथ समझौता कभी पत्रकारों को नहीं करना चाहिए। जो लोग ऐसा करते है वह आगे चल कर बर्बाद हो जाते है। दूसरी सीख उन्होंने यह भी दी कि पत्रकार को कभी भी अपने को जहांगीर नहीं समझना चाहिए। वह किसी को न्याय दिला देगा, यह भ्रम कभी भी नहीं पालना चाहिए। पत्रकार का काम सच को लोगों और व्यवस्था के समक्ष परोसना है। यदि इन दो बातों को लोग अपने जीवन में अमल करें तो बेहतर और बड़ा पत्रकार बन सकता है। एसपी तो नहीं रहे पर उनके ये दो सूत्र वाक्य आज भी मेरे मन को झकझोरता रहता है।



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