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मां के बिना ....

Posted On: 8 Dec, 2017 में

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इस वर्ष की भयंकर बाढ़ ने फूलमणि की जिंदगी की तबाह कर दी। महाप्रलय ने तो उसकी मां को निगल ही लिया। उसके पिता भी विछिप्त जैसे हो गए। लेकिन जब वे मासूम बिटिया को सामने देखते तो दु:खी हो जाते। उनके मन में भी फूलमणि के प्रति प्रेम और वात्सल्य उमड़ पड़ता था। लेकिन पेट की भूख वे ज्यादा दिनों तक सहन नहीं कर सके। उनके सारे प्रेम और वात्सल्य भूख की ज्वाला में जल गए और वे प्रदेश चले गए। सात साल की फूलमणि अकेली रह गई। वह मां-बाप को याद कर रो लेती। कभी सोचने लग जाती की अब उसकी पहाड़ सी जिंदगी कैसे कटेगी। क्या करें न करें। उसने अगमेरी चाची को सब्जी बेचते देखा है। वह भी इसी काम में भीड़ गई। दुकान का दायरा बढ़ता चला गया,और उसके हौसले भी बुलंद होते चले गए। पर उम्र तो भागती रहती है। कई लोगों ने ताने देने शुरू किए। किसी से ब्याह रचा लो,जिंदगी कट जाएगी। लेकिन कम उम्र में ब्याह का परिणाम वह अपने ही घर में देख चुकी थी,सो डरती थी। ऐसी ही स्थिति दिनेश की है। उसे जिस समय मां के दूध की जरूरत थी मां घर छोड़कर चली गई। पिता ने दूसरी शादी कर ली। सौतेली मां अपनी फितरत से बाज नहीं आ रही थी। कभी मारती-पीटती तो कभी धकियाती। उसे कभी लाला जी की दुकान में झाडू लगाने भेजा जाता तो कभी ढाबे पर बर्तन मांजने। वह अपनी जिंदगी से परेशान रहने लगा था। परिणामस्वरूप घर छोड़कर भाग गया। साइकिल की दुकान और किराना स्टोरी में नौकरी कर उसने कुछ पूंजी बना ली। फिर कपड़े की फेरी करने लगा। उस दिन मैंने उससे पूछा परिवार बसा लो। उसका जबाव था हम जैसों का परिवार कहां बसता है बाबू। मैंने देखा उसके चेहरे पर स्वाभिमान था,लेकिन मतलबी लोगों के प्रति घृणा का भाव भी था।
यह कहानी सिर्फ दो बच्चों की नहीं है। यह समस्या देश और राष्ट्रव्यापी है। इस पर गहन चिंतन की आवश्यकता है। बाल विवाह का एक बड़ा कारक यह भी है। स्वयं सेवी संस्था भूमिका बिहार ने कोसी और सीमांचल जिलों दो-दो पंचायतों को जो सर्वे किया है। उसके आंकड़ें चौकाने वाले है।
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आंकड़ों में लावारिश बच्चे
नेशनल फैमली हेल्थ सर्वे में इस बात का उल्लेख किया गया है कि भारत में ऐसे लावारिश बच्चों को संख्या दो करोड़ दस लाख से ज्यादा हैं। ग्रमीण इलाकों में ऐसे बच्चे ज्यादा संख्या में रहते हैं। उत्तर प्रदेश,बिहार और पं.बंगाल में इस तरह की समस्याएं ज्यादा हैं। ऐसे बच्चों के पिता की मौत या तो प्राकृत आपदा में हो गई या फिर बच्चों की मां छोड़कर दूसरे के साथ शादी कर ली। पिता भी गरीबी से तंग आकर प्रदेश चला गया। फिर वापस नहीं लौटा।
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किन जिलों में हुआ सर्वे
1. कटिहार :- बहरखाल- बटबरा =179
2. सुपौल :- कर्णपुर -मलहानी = 35
3.पूर्णिया :-मिसरी नगर- डगरूआ = 39
4.अररिया :-कुसिआर गांव -रामपुर = 19
5.खगडिय़ा :-मथुरापुर – भदास = 29
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कुल बच्चे : 265
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उम्र के हिसाब से विश्लेषण
0 से पांच : 42
6 से दस : 128
10 से 18 :108
यह सर्वे पांच हजार सात से घरों का किया गया था।
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भूमिका बिहार की निदेशक शिल्पी सिंह का कहना है कि यह समस्या बहुत बढ़ी है। लावारिश बच्चों की समस्या बहुत गंभीर है। ऐसे बच्चों का पालन-पोषण रिश्तेदारों को भरोसे हो रहा है। रिश्तेदार ऐसे बच्चों को साथ कैसा व्यवहार करते है यह किसी से छिपी नहीं है।

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